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Bharat Ki Videsh Niti In Hindi Essay On Mother

लालबहादुर शास्त्री (जन्म: 2 अक्टूबर 1904 मुगलसराय - मृत्यु: 11 जनवरी 1966 ताशकन्द), भारत के दूसरे प्रधानमन्त्री थे। वह 9 जून1964 से 11 जनवरी1966 को अपनी मृत्यु तक लगभग अठारह महीने भारत के प्रधानमन्त्री रहे। इस प्रमुख पद पर उनका कार्यकाल अद्वितीय रहा।

भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात शास्त्रीजी को उत्तर प्रदेश के संसदीय सचिव के रूप में नियुक्त किया गया था। गोविंद बल्लभ पंत के मन्त्रिमण्डल में उन्हें पुलिस एवं परिवहन मन्त्रालय सौंपा गया। परिवहन मन्त्री के कार्यकाल में उन्होंने प्रथम बार महिला संवाहकों (कण्डक्टर्स) की नियुक्ति की थी। पुलिस मन्त्री होने के बाद उन्होंने भीड़ को नियन्त्रण में रखने के लिये लाठी की जगह पानी की बौछार का प्रयोग प्रारम्भ कराया। 1951 में, जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में वह अखिल भारत काँग्रेस कमेटी के महासचिव नियुक्त किये गये। उन्होंने 1952, 1957 व 1962 के चुनावों में कांग्रेस पार्टी को भारी बहुमत से जिताने के लिये बहुत परिश्रम किया।

जवाहरलाल नेहरू का उनके प्रधानमन्त्री के कार्यकाल के दौरान 27 मई, 1964 को देहावसान हो जाने के बाद साफ सुथरी छवि के कारण शास्त्रीजी को 1964 में देश का प्रधानमन्त्री बनाया गया। उन्होंने 9 जून 1964 को भारत के प्रधान मन्त्री का पद भार ग्रहण किया।

उनके शासनकाल में 1965 का भारत पाक युद्ध शुरू हो गया। इससे तीन वर्ष पूर्व चीन का युद्ध भारत हार चुका था। शास्त्रीजी ने अप्रत्याशित रूप से हुए इस युद्ध में नेहरू के मुकाबले राष्ट्र को उत्तम नेतृत्व प्रदान किया और पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी। इसकी कल्पना पाकिस्तान ने कभी सपने में भी नहीं की थी।

ताशकन्द में पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब ख़ान के साथ युद्ध समाप्त करने के समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद 11 जनवरी 1966 की रात में ही रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी।

उनकी सादगी, देशभक्ति और ईमानदारी के लिये मरणोपरान्त भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

संक्षिप्त जीवनी[संपादित करें]

लालबहादुर शास्त्री का जन्म 1904 में मुगलसराय (उत्तर प्रदेश) में मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव के यहाँ हुआ था। उनके पिता प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे अत: सब उन्हें मुंशीजी ही कहते थे। बाद में उन्होंने राजस्व विभाग में लिपिक (क्लर्क) की नौकरी कर ली थी।[1] लालबहादुर की माँ का नाम रामदुलारी था। परिवार में सबसे छोटा होने के कारण बालक लालबहादुर को परिवार वाले प्यार में नन्हें कहकर ही बुलाया करते थे। जब नन्हें अठारह महीने का हुआ दुर्भाग्य से पिता का निधन हो गया। उसकी माँ रामदुलारी अपने पिता हजारीलाल के घर मिर्ज़ापुर चली गयीं। कुछ समय बाद उसके नाना भी नहीं रहे। बिना पिता के बालक नन्हें की परवरिश करने में उसके मौसा रघुनाथ प्रसाद ने उसकी माँ का बहुत सहयोग किया। ननिहाल में रहते हुए उसने प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की। उसके बाद की शिक्षा हरिश्चन्द्र हाई स्कूल और काशी विद्यापीठ में हुई। काशी विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि मिलने के बाद उन्होंने जन्म से चला आ रहा जातिसूचक शब्द श्रीवास्तव हमेशा हमेशा के लिये हटा दिया और अपने नाम के आगे 'शास्त्री' लगा लिया। इसके पश्चात् शास्त्री शब्द लालबहादुर के नाम का पर्याय ही बन गया।

1928 में उनका विवाह मिर्जापुर निवासी गणेशप्रसाद की पुत्री ललिता से हुआ। ललिता शास्त्री से उनके छ: सन्तानें हुईं, दो पुत्रियाँ-कुसुम व सुमन और चार पुत्र-हरिकृष्ण, अनिल, सुनील व अशोक। उनके चार पुत्रों में से दो-अनिल शास्त्री और सुनील शास्त्री अभी हैं, शेष दो दिवंगत हो चुके हैं। अनिल शास्त्री कांग्रेस पार्टी के एक वरिष्ठ नेता हैं जबकि सुनील शास्त्री भारतीय जनता पार्टी में चले गये।

राजनीतिक जीवन[संपादित करें]

संस्कृत भाषा में स्नातक स्तर तक की शिक्षा समाप्त करने के पश्चात् वे भारत सेवक संघ से जुड़ गये और देशसेवा का व्रत लेते हुए यहीं से अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत की। शास्त्रीजी सच्चे गान्धीवादी थे जिन्होंने अपना सारा जीवन सादगी से बिताया और उसे गरीबों की सेवा में लगाया। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के सभी महत्वपूर्ण कार्यक्रमों व आन्दोलनों में उनकी सक्रिय भागीदारी रही और उसके परिणामस्वरूप उन्हें कई बार जेलों में भी रहना पड़ा। स्वाधीनता संग्राम के जिन आन्दोलनों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही उनमें 1921 का असहयोग आंदोलन, 1930 का दांडी मार्च तथा 1942 का भारत छोड़ो आन्दोलन उल्लेखनीय हैं।

दूसरे विश्व युद्ध में इंग्लैण्ड को बुरी तरह उलझता देख जैसे ही नेताजी ने आजाद हिन्द फौज को "दिल्ली चलो" का नारा दिया, गान्धी जी ने मौके की नजाकत को भाँपते हुए 8 अगस्त 1942 की रात में ही बम्बई से अँग्रेजों को "भारत छोड़ो" व भारतीयों को "करो या मरो" का आदेश जारी किया और सरकारी सुरक्षा में यरवदा पुणे स्थित आगा खान पैलेस में चले गये। 9 अगस्त 1942 के दिन शास्त्रीजी ने इलाहाबाद पहुँचकर इस आन्दोलन के गान्धीवादी नारे को चतुराई पूर्वक "मरो नहीं, मारो!" में बदल दिया और अप्रत्याशित रूप से क्रान्ति की दावानल को पूरे देश में प्रचण्ड रूप दे दिया। पूरे ग्यारह दिन तक भूमिगत रहते हुए यह आन्दोलन चलाने के बाद 19 अगस्त 1942 को शास्त्रीजी गिरफ्तार हो गये।

शास्त्रीजी के राजनीतिक दिग्दर्शकों में पुरुषोत्तमदास टंडन और पण्डित गोविंद बल्लभ पंत के अतिरिक्त जवाहरलाल नेहरू भी शामिल थे। सबसे पहले 1929 में इलाहाबाद आने के बाद उन्होंने टण्डनजी के साथ भारत सेवक संघ की इलाहाबाद इकाई के सचिव के रूप में काम करना शुरू किया। इलाहाबाद में रहते हुए ही नेहरूजी के साथ उनकी निकटता बढी। इसके बाद तो शास्त्रीजी का कद निरन्तर बढता ही चला गया और एक के बाद एक सफलता की सीढियाँ चढते हुए वे नेहरूजी के मंत्रिमण्डल में गृहमन्त्री के प्रमुख पद तक जा पहुँचे। और इतना ही नहीं, नेहरू के निधन के पश्चात भारतवर्ष के प्रधान मन्त्री भी बने।

प्रधान मन्त्री[संपादित करें]

उनकी साफ सुथरी छवि के कारण ही उन्हें 1964 में देश का प्रधानमन्त्री बनाया गया। उन्होंने अपने प्रथम संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि उनकी शीर्ष प्राथमिकता खाद्यान्न मूल्यों को बढ़ने से रोकना है और वे ऐसा करने में सफल भी रहे। उनके क्रियाकलाप सैद्धान्तिक न होकर पूर्णत: व्यावहारिक और जनता की आवश्यकताओं के अनुरूप थे।

निष्पक्ष रूप से यदि देखा जाये तो शास्त्रीजी का शासन काल बेहद कठिन रहा। पूँजीपति देश पर हावी होना चाहते थे और दुश्मन देश हम पर आक्रमण करने की फिराक में थे। 1965 में अचानक पाकिस्तान ने भारत पर सायं 7.30 बजे हवाई हमला कर दिया। परम्परानुसार राष्ट्रपति ने आपात बैठक बुला ली जिसमें तीनों रक्षा अंगों के प्रमुख व मन्त्रिमण्डल के सदस्य शामिल थे। संयोग से प्रधानमन्त्री उस बैठक में कुछ देर से पहुँचे। उनके आते ही विचार-विमर्श प्रारम्भ हुआ। तीनों प्रमुखों ने उनसे सारी वस्तुस्थिति समझाते हुए पूछा: "सर! क्या हुक्म है?" शास्त्रीजी ने एक वाक्य में तत्काल उत्तर दिया: "आप देश की रक्षा कीजिये और मुझे बताइये कि हमें क्या करना है?"

शास्त्रीजी ने इस युद्ध में नेहरू के मुकाबले राष्ट्र को उत्तम नेतृत्व प्रदान किया और जय जवान-जय किसान का नारा दिया। इससे भारत की जनता का मनोबल बढ़ा और सारा देश एकजुट हो गया। इसकी कल्पना पाकिस्तान ने कभी सपने में भी नहीं की थी।

[[चित्|thumb|ब्रिगेडियर हरी सिंह, जो उस समय प्रथम भारतीय बख्तरबंद डिविजन की १८वीं यूनिट में सैनिक थे, लाहौर (पाकिस्तान) में बरकी पुलिस थाने के बाहर तैनात]] भारत पाक युद्ध के दौरान ६ सितम्बर को भारत की १५वी पैदल सैन्य इकाई ने द्वितीय विश्व युद्ध के अनुभवी मेजर जनरल प्रसाद के नेत्तृत्व में इच्छोगिल नहर के पश्चिमी किनारे पर पाकिस्तान के बहुत बड़े हमले का डटकर मुकाबला किया। इच्छोगिल नहर भारत और पाकिस्तान की वास्तविक सीमा थी। इस हमले में खुद मेजर जनरल प्रसाद के काफिले पर भी भीषण हमला हुआ और उन्हें अपना वाहन छोड़ कर पीछे हटना पड़ा। भारतीय थलसेना ने दूनी शक्ति से प्रत्याक्रमण करके बरकी गाँव के समीप नहर को पार करने में सफलता अर्जित की। इससे भारतीय सेना लाहौर के हवाई अड्डे पर हमला करने की सीमा के भीतर पहुँच गयी। इस अप्रत्याशित आक्रमण से घबराकर अमेरिका ने अपने नागरिकों को लाहौर से निकालने के लिये कुछ समय के लिये युद्धविराम की अपील की।

आखिरकार रूस और अमरिका की मिलीभगत से शास्त्रीजी पर जोर डाला गया। उन्हें एक सोची समझी साजिश के तहत रूस बुलवाया गया जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। हमेशा उनके साथ जाने वाली उनकी पत्नी ललिता शास्त्री को बहला फुसलाकर इस बात के लिये मनाया गया कि वे शास्त्रीजी के साथ रूस की राजधानी ताशकन्द न जायें और वे भी मान गयीं। अपनी इस भूल का श्रीमती ललिता शास्त्री को मृत्युपर्यन्त पछतावा रहा। जब समझौता वार्ता चली तो शास्त्रीजी की एक ही जिद थी कि उन्हें बाकी सब शर्तें मंजूर हैं परन्तु जीती हुई जमीन पाकिस्तान को लौटाना हरगिज़ मंजूर नहीं। काफी जद्दोजहेद के बाद शास्त्रीजी पर अन्तर्राष्ट्रीय दबाव बनाकर ताशकन्द समझौते के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करा लिये गये। उन्होंने यह कहते हुए हस्ताक्षर किये थे कि वे हस्ताक्षर जरूर कर रहे हैं पर यह जमीन कोई दूसरा प्रधान मन्त्री ही लौटायेगा, वे नहीं। पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब ख़ान के साथ युद्धविराम के समझौते पर हस्ताक्षर करने के कुछ घण्टे बाद 11 जनवरी 1966 की रात में ही उनकी मृत्यु हो गयी। यह आज तक रहस्य[2] बना हुआ है कि क्या वाकई शास्त्रीजी की मौत हृदयाघात के कारण हुई थी? कई लोग उनकी मौत की वजह जहर[3] को ही मानते हैं।

शास्त्रीजी को उनकी सादगी, देशभक्ति और ईमानदारी के लिये आज भी पूरा भारत श्रद्धापूर्वक याद करता है। उन्हें मरणोपरान्त वर्ष 1966 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

रहस्यपूर्ण मृत्यु[संपादित करें]

ताशकन्द समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद उसी रात उनकी मृत्यु हो गयी। मृत्यु का कारण हार्ट अटैक बताया गया। शास्त्रीजी की अन्त्येष्टि पूरे राजकीय सम्मान के साथ शान्तिवन (नेहरू जी की समाधि) के आगे यमुना किनारे की गयी और उस स्थल को विजय घाट नाम दिया गया। जब तक कांग्रेस संसदीय दल ने इन्दिरा गान्धी को शास्त्री का विधिवत उत्तराधिकारी नहीं चुन लिया, गुलजारी लाल नन्दा कार्यवाहक प्रधानमन्त्री रहे।[4]

शास्त्रीजी की मृत्यु को लेकर तरह-तरह के कयास लगाये जाते रहे। बहुतेरे लोगों का, जिनमें उनके परिवार के लोग भी शामिल हैं, मत है कि शास्त्रीजी की मृत्यु हार्ट अटैक से नहीं बल्कि जहर देने से ही हुई।[2] पहली इन्क्वायरी राज नारायण ने करवायी थी, जो बिना किसी नतीजे के समाप्त हो गयी ऐसा बताया गया। मजे की बात यह कि इण्डियन पार्लियामेण्ट्री लाइब्रेरी में आज उसका कोई रिकार्ड ही मौजूद नहीं है।[5] यह भी आरोप लगाया गया कि शास्त्रीजी का पोस्ट मार्टम भी नहीं हुआ। 2009 में जब यह सवाल उठाया गया तो भारत सरकार की ओर से यह जबाव दिया गया कि शास्त्रीजी के प्राइवेट डॉक्टर आर०एन०चुघ और कुछ रूस के कुछ डॉक्टरों ने मिलकर उनकी मौत की जाँच तो की थी परन्तु सरकार के पास उसका कोई रिकॉर्ड नहीं है। बाद में प्रधानमन्त्री कार्यालय से जब इसकी जानकारी माँगी गयी तो उसने भी अपनी मजबूरी जतायी।[2]

शास्त्रीजी की मौत में संभावित साजिश की पूरी पोल आउटलुक नाम की एक पत्रिका ने खोली।[5][5] 2009 में, जब साउथ एशिया पर सीआईए की नज़र (अंग्रेजी: CIA's Eye on South Asia) नामक पुस्तक के लेखक अनुज धर ने सूचना के अधिकार के तहत माँगी गयी जानकारी पर प्रधानमन्त्री कार्यालय की ओर से यह कहना कि "शास्त्रीजी की मृत्यु के दस्तावेज़ सार्वजनिक करने से हमारे देश के अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध खराब हो सकते हैं तथा इस रहस्य पर से पर्दा उठते ही देश में उथल-पुथल मचने के अलावा संसदीय विशेषधिकारों को ठेस भी पहुँच सकती है। ये तमाम कारण हैं जिससे इस सवाल का जबाव नहीं दिया जा सकता।"।[2]

सबसे पहले सन् 1978 में प्रकाशित[6] एक हिन्दी पुस्तक ललिता के आँसू[7] में शास्त्रीजी की मृत्यु की करुण कथा को स्वाभाविक ढँग से उनकी धर्मपत्नी ललिता शास्त्री के माध्यम से कहलवाया गया था। उस समय (सन् उन्निस सौ अठहत्तर में) ललिताजी जीवित थीं।[8]

यही नहीं, कुछ समय पूर्व प्रकाशित एक अन्य अंग्रेजी पुस्तक में लेखक पत्रकार कुलदीप नैयर ने भी, जो उस समय ताशकन्द में शास्त्रीजी के साथ गये थे, इस घटना चक्र पर विस्तार से प्रकाश डाला है। गत वर्ष जुलाई 2012 में शास्त्रीजी के तीसरे पुत्र सुनील शास्त्री ने भी भारत सरकार से इस रहस्य पर से पर्दा हटाने की माँग की थी।[9]

सन्दर्भ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

"मरो नहीं, मारो!" का नारा लालबहादुर शास्त्री ने दिया जिसने क्रान्ति को पूरे देश में प्रचण्ड किया।
मुंबई में शास्त्रीजी की आदमकद प्रतिमा
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प्रस्तावना: किसी देश की विदेश नीति उसके राष्ट्रीय हितों के अनुरूप दूसरों देशों के साथ आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक तथा सैनिक विषयों पर पालन की लाने वाली नीतियों का समुच्चय होती है, न तो किसी देश की परिस्थिति एवं न ही दुनिया की परिस्थिति सदैव एक समान रहती है। इसलिए बदलती अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थिति में राष्ट्रीय हितों के दृष्टिकोण से समयानुसार किसी भी देश की विदेश नीति में परिवर्तन होना स्वाभाविक है। यही कारण है कि कोई देश न तो किसी का स्थायी मित्र होता है और न ही स्थायी शत्रु। इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में इसे दुनिया में तेजी से उभरते हुए एक शक्ति के तौर पर देखा जाता है। भारत को भी अपने राष्ट्रीय हितों को देखते हुए समय-समय पर अपनी विदेश नीति में परिवर्तन करना पड़ता है। अभी तक मोदी ‘ब्रिक्स’ में हुई भेंटों के अलावा सार्क देश भूटान, जापान, चीन और अमेरिका से मिले हैं। 22 मई, 2014 को मोदी जी शपथ ग्रहण समारोह में सार्क के सभी देशों को बुलाया था। उसके बाद 27 मई को पाकिस्तान के प्रधान मंत्री को भारत बुलाया गया। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ उनके शपथ ग्रहण समारोह में भी उपस्थित थे।

पाकिस्तान यूरोप

देश में आलू की कीमतों पर लगान लगाने के लिए सरकार इसे विदेश से मांगने जा रही है। ऐसा पहली बार है जब देश में आलू का आयात होगा। आलू आम लोगों की रसाई में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली कृषि उपज है। खुदरा बाजार में इसके दाम 30 से 45 रूपये प्रति किलो तक पहुँच गए हैं। कृषि सचिव आशीष बहुगुणा ने गुरूवार को आलू आयात के फैसले की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इसका उद्देश्य घरेलू बाजार में इसकी कीमत पर लगान लगाना और सप्लाई सुधारना है। सहकारी संस्था नैफेड इस महीने आयात के टेण्डर जारी करेगी। इसका आयात पाकिस्तान और यूरोप के देशों से किया जाएगा। यह फैसला कीमतों पर लगान के लिए मोदी सरकार का है।

पाकिस्तान व भारत

भारत दोनों देशों में सिवित सोसायटी शान्ति देखना चाहती है। इस दिशा में काफी प्रयास किया है। भारत ने इसी महीने दिल्ली में शुरू हो रहे विश्व व्यापार मेले में 500 पाकिस्तानियों को वीजा दिया है। ये लोग व्यापार मेले में फूड वेशन, हेण्डीक्राफ्ट आदि के स्टॉल लगायेंगे। फिर पाकिस्तान आतंकवादी की आड़ में भी छंदम नीति रोकी नहीं। इसलिए भारत पाकिस्तान से विदेश नीति के खास मुद्दे में भरोसा नहीं कर सकता है। भारत में पाकिस्तान के प्रधान मंत्री आये और पीछे से कश्मीर में घुसपेठ कर रहा था व है, इसलि पहले आतंक के मुद्दों को कम करना चाहिए। अभी तक पाकिस्तान भारत की सीमा लगातार हमला कर रहे है, जिससे सीमा पर तैनात हमारे कितने ही जवान मारे गये हैं। इसलिए इस पर विश्वास नहीं किया जा सकता है।

नरेन्द्र मोदी जी ने कहा है कि बातचीत की शर्तें भारत तय करेगा। धमाकों के बीच बात नहीं हो सकती है। पाकिस्तान अनसुलझे मसलों को शिमला समझौते और लाहौर घोषणा के तहत सुलझाए। इसलिए 25 अगस्त को होने वाली दोनों देशों के विदेश की बैठक रद्द कर दी गई है।

बिटस देश

ब्राजील, रूस, भारत, दक्षिण अफ्रीका का अपना अन्तर्राष्ट्रीय बैंक बनाने का सपना आखिरकार हकीकत बन गया है। बैंक ने पाँचों देशों के सदस्यों की हिस्सेदारी समान होगी।

अमेरिका में नरेन्द्र मोदी की विदेश नीति

स्वागत - वाशिंगटन के एण्ड्रूज एयर बेस से व्हाइट हाउस तक सड़क के दोनों ओर प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वागत के लोग उमड़ पड़े। फिर पहली बार ब्लेयर हाउस से मोदी भारतीय प्रतिनिधिमण्डल के साथ व्हाइट हाउस पहुँचे तो दक्षिणी गेट पर ओबामा ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। मौका था ओबामा की ओर से मोदी को दिए डिनर कराने का। पहली ही मुलाकात में दोनों ने साथ-साथ चलने का वादा किया। अमेरिका के प्रमुख अखबार वाशिंगटन पोस्ट में संयुक्त सम्पादकीय लिख दुनिया को भी बता दिया कि 21वीं सदी के लिए यह भारत-अमेरिका की नई साझेदारी है।

अमेरिका ने इसे विजन स्टेटमेन्ट बताते हुए लिखा - ‘चले साथ-साथ फॉरवर्ड टूगेदर वी गो’। डिनर के बहाने 90 मिनट तक चली इस मुलाकात में दोनों ने अपने विचार, अनुभव और विजन साझा किए और साथ-साथ आगे बढ़े।

मोदी ने ओबामा को खादी में लिपटी महात्मा गांधी की व्याख्या वाली गीता भेंट की व गांधी संग लूथर की यादों के वर्ष 1959 भारत में दिए भाषण की वीडियो क्लिप और उनकी तस्वीर भी ओबामा को भेंट की। डिनर में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और अमेरिकी उपराष्ट्रपति जो बिडेन समेत दोनों देशों के नौ-नौ वरिष्ठतम अधिकारी शामिल हुए।

विजन स्टेटमेन्ट - दोनों देश इन पर एकमत हुए:-

1. आतंक के खिलाफ - आतंकवाद के खिलाफ मिलकर लड़ेंगे। दुनिया को हथियार मुक्त करेंगे और अन्य देशों के परमाणु हथियार कम करेंगे।

2. सुरक्षा परिषद् में सुधार - संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में सुधार के लिए सहयोग करेंगे, जिसमें भारत बड़ी भूमिका निभाने के लिए तैयार है।

3. जलवायु परिवर्तन - इसके प्रभाव को कम करने के लिए मिलकर काम करेंगे। अमेरिकी परमाणु बिजली तकनीक भारत लाने में मदद करेंगे।

4. कौशल विकास - दोनों देशों के बीच कौशल और ज्ञान का आदान-प्रदान करेंगे, जो दोनों देशों को आगे ले जाने में मददगार साबित होगा।

5. विश्व में मिसाल - 21वीं सदी में भरोसेमन्द सहयोगी बनने के लिए हमारी वृहद सोच है। हमारी साझेदारी विश्व के लिए मिसाल होगी।

यह सब एकमत मोदी ने दूसरी मुलाकात में किया था।

6. खाद्यान्न व सोना - अमेरिका से इसका भी लेना हुआ था।

मोदी की स्मार्ट सिटी योजना के लिए अमेरिकी कम्पनियाँ सहयोग करेंगी। दोनों की बातचीत के बाद अजमेर, ईलाहाबाद और विजाग को स्मार्ट सिटी बनाने में अमेरिका प्रमुख भागीदार होगा। इसके अलावा भारतीय राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय के निर्माण में भी वह अहम भूमिका अदा करेगा।

दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच आर्थिक और रणनीतिक मुद्दों पर भी बात हुई। मोदी ने भारतीय आई.टी. कम्पनियों के हितों का मुद्दा उठाते हुए ओबामा जी से आग्रह किया कि वह ऐसे कदम उठाएं, जिससे भारतीय कम्पनियाँ अमेरिकी अर्थव्यवस्था तक पहुँच सकें व ओबामा जी ने इस मसले का हल निकालने का भरोसा दिलाया है। मोदी जी ने डब्ल्यू.टी.ओ. में व्यापार समझौते का मुद्दा भी उठाया था।

एक-दूसरे के प्रति सम्मान और सद्भावना के इजहार के बावजूद परमाणु दुर्घटना उत्तरदायित्व कानून, डब्ल्यू.टी.ओ. वार्ता एवं निवेश अथवा कारोबार के प्रतिकूल मानी जाने वाली अन्य समस्याओं का समाधान नहीं निकला। बहरहाल मोदी की अमेरिका यात्रा को देखने का दूसरा नजरिया भी है। वह यह कि इस दौरान मोदी सरकार की विदेश नीति स्पष्ट रूप से दुनिया के सामने आई।

मोदी ने इजरायल के प्रधान मंत्री बेजामिन नेतन्याहू से मुलाकात की, जिसे भारतीय विदेश नीति में बड़ा परिवर्तन माना गया।

मोदी की अमेरिका की यात्रा 26 सितम्बर से 30 सितम्बर तक रहीं। अमेरिका के कार्यक्रम में 400 संगठनों के सदस्यों ने हिस्सा लिया। मोदी की अमेरिका यात्रा काफी हद तक सफल रही है।

मोदी ने अपनी इस अमेरिका यात्रा के दौरान यह सिद्ध कर दिया कि वे जनसम्पर्क कला के महान कलाकार हैं और उन्होंने आशाओं के दव्ार खोल दिए हैं। उनके दव्ारा रोपे गए बीजों को सिंचित, पल्लवित और पुष्पित करने का काम वहाँ रहकर सुषमा स्वराज और अजित डोभाल कर रहे हैं। अमेरिका और चीन जैसी महाशक्तियों के साथ थोड़ा धैर्य रखना पड़ेगा। विदेश नीति का हाल यही है। कभी यह सरपट दौड़ती है और कभी वह हर डग सम्भल-सम्भलकर भरती है।

अमेरिका में पहली बार - (1) सबसे बड़ी यात्रा करने वाले पहले राष्ट्र प्रमुख। (2) कोई शासनाध्यक्ष मेडिसन स्क्वेयर गार्डन से दुनिया को लाईव सम्बोधित करेगा। (3) पहली बार भारतीय समुदाय इस तरह सड़कों पर उतरा। (4) पहली बार किसी प्रधान मंत्री की कॉर्पोरेट हस्तियों से वन-टू-वन। (5) पहली बार वीजा प्रतिबन्ध का सामना कर चुके किसी प्रधान मंत्री को अमेरिकी राष्ट्रपति का न्यौता। (6) मोदी के विरूद्ध उनकी न्यू यॉर्क में मौजुदगी के दौरान अदालत ने समय जारी किया।

भारत में चीन सरकार

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा अहमदाबाद से शुरू की। इससे पहले प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने ट्िवटर पर उनका स्वागत किया। उन्होंने कहा कि ‘बौद्ध धर्म ने दोनों देशों के बीच सम्बन्धों को मजबूत बनाया है। वे 17 सितम्बर भारत आये थे। चीन के राष्ट्रपति विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से 18 सितम्बर को मुलाकात की। इस दिन वे राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी से मिलेंगे व 19 सितम्बर को डॉ. कोटनीस के परिजनों से मिले थे। उसके बाद लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिलेंगे। यह यात्रा 17 सितम्बर से 19 सितम्बर तक रहेगी।

चीनी राष्ट्रपति के गुजरात दौरे के लिए सुरक्षा के बड़े इन्तजाम किये गये हैं। रिवरफ्रण्ट पर 1500 जवानों को तैनात किया है। हवा, जल और जमीन तीनों स्तरों पर अभेध सुरक्षा होगी।

चीन हमसे क्या चाहते है?

भारत से रिश्ते सुधारना चाहता है। भारत में इन्फ्रा योजनाओं में निवेश करना चाहता है। करीब 100 बिलियन डॉलर (6 लाख करोड़ रूपये) के निवेश के करार कर सकता है। भारत के साथ भी वास्तविक नियंत्रण रेखा का विवाद सुलझाना चाहता है। चीन इस समय दुनिया का सबसे बड़ा मैन्यूफैक्चरर है। वह पड़ौस में इतनी बड़े बाजार की अनदेखी नहीं कर सकता है।

हम यह चाहते है

सीमा विवाद सुलझाएं। इण्डस्ट्रीयल पार्क, रेल्वे, हाईवे, पॉवर, ऑटोमोबाइल, टेक्सटाईल्स और फूड प्रोसेसिंग के क्षेत्र में निवेश करें। चीन भारतीय कम्पनियों पर लगी पाबन्दियाँ हटाये ताकि परस्पर व्यापार घाटे को कम किया जा सके, जो पिछले साल 33 लाख डॉलर था। चीन परमाणु तकनीक और बेलिस्टिक मिसाइल पाकिस्तान को न दे। उपमहादव्ीप में नई सुरक्षा समस्याएँ पैदा न करें।

भारत ने राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की वियतनाम यात्रा के दौरान चीन को परोक्ष रूप से सख्त संदेश दिया। इसके तहत वियतनाम और भारत के बीच दक्षिण चीन सागर में तेल खोजने पर समझौता हुआ। इसके अलावा अन्य प्रमुख समझौते ये है सीमा शुल्क संबंधी मसलों पर आपसी सहयोग। रक्षा उपकरणों की खरीद के लिए वियतनाम को 10 करोड़ डॉलर (करीब 610 करोड़ रूपये) का लाईन ऑफ क्रेडिट यानि भारत से वियतनाम इतनी रकम के रक्षा उपकरण निश्चित अवधि तक कभी भी ले सकेगा। पशु स्वास्थ्य क्षेत्र में समन्वय बढ़ाने पर सहमति। युवाओं के कौशल एवं उद्यमिता विकास में सहयोग करना। पहली बार भारतीय विमानन कम्पनी जेट एयरवेज और एयर वियतनाम के बीच समझौता हुआ। पाँच नवम्बर से मुम्बई-हनोई के बीच रोज सीधी उड़ान शुरू होगी।

पहली बार किसी विदेशी राष्ट्र प्रमुख ने गुजरात से भारत यात्रा शुरू की। इसमें चीन से तीन करार मिले:-

1. विकास में मदद गुजरात को - ग्वांगडोंग चीन के विकसित प्रान्त में से एक है। उसी की तर्ज पर गुजरात में विकास होगा।

2. सिस्टर सिटी - ग्वांगडोंग की राजधानी ग्वांगझू है। इसकी तर्ज पर अहमदाबाद को विकसित किया जायेगा।

3. औद्योगिक पार्क - गुजरात औद्योगिक विकास निगम और चाईना डेवलपमेन्ट बैंक के बीच कराकर हुआ है।

इनके अलावा जो 12 करार हुए उनमें न तो सहमति हुई, न कोई समझौता हुआ है, जैसे-

1. सीमा विवाद का मुद्दा।

2. रेल्वे और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर।

3. रेल्वे यूनिवरसिटी स्थापित करना।

4. पुणे में ऑटो पार्क बनाने सहित कई ऐसे मुद्दे है, जिनमें कुछ नहीं हुआ।

जिनपिंग का एक सम्पादकीय बुधवार को भारत के एक अंग्रेजी अखबार में छपा। भारत यात्रा का कोकस विवाद नहीं, विकास रहेगा। चीन अगर ‘दुनिया की फैक्ट्री’ है तो भारत ‘दुनिया बैंक ऑफिस’।

दोनों देशों के बीच प्रमुख राजनीतिक समस्याएँ जयों की त्यों खड़ी है। उन्हें हल करने में चीन की कोई खास रूचि नहीं है। दोनों देशों के बीच दर्जन भर समझौते हुए है, वे अपने आप में एक नमूना हैं। दोनों देश यदि पारस्परिक सहयोग करें तो चीन ‘विश्व कारखाना’ और भारत ‘विश्व कार्यालय’ बन सकता है।

जापान के साथ ठोस उपलब्धियाँ हुई है। नरेन्द्र मोदी ने विदेश नीति के बारे में कहा है कि भारत, चीन और जापन मिलकर एशिया का नेतृत्व कर सकते है। यदि वे भू-क्षेत्रीय विवादों में अपना रवैय बदले। भू-क्षेत्रीय विवाद में सेकांकू दव्ीप समूह तथा तेल क्षेत्र शामिल है। इसके लिए चीन जापान को दोष देता है व जापान चीन को। इसी तरह भारत औरचीन में सीमा विवाद है। इसलिए हम तीनों देश को मिलकर, बैठकर सहयोग व शान्ति से समझौता करना चाहिए। 21वीं सदी को यह नई दिशा देने में अवश्य सफल होगी और हमारा आयात-निर्यात को बढ़ावा मिलेगा। मोदी ने कहा देश को मजबुत नेता चाहिए, जिसकी ताकत निर्णायक जनमत हो। विदेश नीति को नये आयाम दे सकता है।

उपसंहार

भारत को वैश्विक परिदृश्य एवं अपने राष्ट्रीय हितों को देखते हुए बार-बार अपनी विदेश नीति में परिवर्तन करना पड़ा है। वर्तमान समय में यह विश्व शक्ति बनने की ओर अग्रसर है। आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा संकट इत्यादि वैश्विक समस्याओं से निपटने में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण होगी। ऐसी स्थिति में इसे विशेष रूप से सावधान रहने की जरूरत है। प्राचीन काल से भारत का सिद्धान्त ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का रहाहै। इसी सिद्धान्त का अमल करते हुए विश्व शान्ति के लिए भी इसे विशेष प्रयास करने होंगे।

- Published/Last Modified on: November 13, 2014

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